समिति प्रभारी मोहन जांगड़े और लेखापाल श्रीमती कुसुमलता निषाद को नोटिसों से कोई फर्क नहीं पड़ता है ।
रिपोर्टर मयंक गुप्ता महासमुंद, 15 फरवरी 2026 छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में धान खरीदी की आड़ में करोड़ों रुपये का कथित घोटाला सामने आया है, जो राज्य की सहकारी व्यवस्था की जड़ों को खोखला करने वाली साजिश का नंगा चेहरा पेश कर रहा है। ग्रामीण सेवा सहकारी समिति, बिरकोनी के प्रभारी मोहन सिंह जांगड़े और लेखापाल कुसुमलता निषाद पर लगे आरोपों ने न केवल स्थानीय किसानों का भरोसा तोड़ा है, बल्कि पूरे प्रणाली पर भ्रष्टाचार का दाग लगा दिया है। फर्जी दस्तावेजों से की गई खरीदी, स्टॉक में जानबूझकर की गई हेराफेरी और सरकारी फंड का बेशर्म दुरुपयोग—ये आरोप अब जिला सहकारी केंद्रीय बैंक की जांच रिपोर्ट में साकार हो चुके हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह मामला भी प्रशासनिक फाइलों की भूलभुलैया में दफन हो जाएगा, या आखिरकार कोई सख्त कदम उठेगा..?जांच की शुरुआत शिकायतों ने खोली आंखें
यह कांड तब उजागर हुआ जब तुमगांव शाखा के प्रबंधक ने औपचारिक शिकायत दर्ज कराई। प्राधिकृत अधिकारी के पत्र के आधार पर रायपुर स्थित जिला सहकारी केंद्रीय बैंक ने तुरंत प्रारंभिक जांच शुरू की, जिसमें वित्तीय अनियमितताओं के स्पष्ट संकेत मिले। सूत्रों के मुताबिक, बिरकोनी समिति में धान खरीदी के नाम पर बिना किसी किसान की मौजूदगी के टोकन और आवक पर्ची के बिना ही ऑनलाइन रिकॉर्ड में हेराफेरी की गई। उधारी के बहाने फर्जी लेन-देन दर्ज किए गए, जिससे स्टॉक का मिलान करते समय भारी अंतर सामने आया। संयुक्त लेखा परीक्षण में जो आंकड़े निकले, वे चौंकाने वाले हैं। बिरकोनी केंद्र में कुल 75,303.20 क्विंटल धान की खरीदी के दावे के मुकाबले महज 930.73 क्विंटल की कमी पाई गई, जिसकी कीमत करीब 21 लाख 40 हजार 679 रुपये आंकी गई। इसी तरह, कांपा केंद्र में 605.59 क्विंटल धान गायब होने की पुष्टि हुई, जिसका मूल्य 13 लाख 92 हजार 857 रुपये है। कुल मिलाकर, यह घोटाला 35 लाख रुपये से अधिक का है, जो सीधे सरकारी खजाने पर बोझ डाल रहा है। दोनों केंद्रों के जिम्मेदार अधिकारियों को रिकवरी का आदेश जारी कर सात दिनों के अंदर राशि जमा करने का फरमान सुनाया गया, लेकिन अब तक कोई ठोस प्रगति नहीं हुई।नोटिसों की बौछार, कार्रवाई का सन्नाटा

बैंक प्रबंधन ने इस मामले को हल्के में नहीं लिया। 16 जनवरी 2026 को पत्र संख्या 3066 के जरिए आरोपी अधिकारियों को तीन दिनों के अंदर स्पष्टीकरण मांगा गया। इससे पहले अक्टूबर 2025 में नोटिस क्रमांक 2249 जारी कर सात दिनों में पूरी राशि जमा करने का अल्टीमेटम दिया गया था। लेकिन समय सीमा लांघ जाने के बावजूद न तो रिकवरी की कोई पुष्टि हुई और न ही निलंबन या विभागीय जांच जैसी कोई कड़ी कार्रवाई का ऐलान। स्थानीय किसान संगठनों का आरोप है कि यह 'नोटिस का ढोंग' मात्र है, जिसका मकसद मामले को लटकाना है। क्या उच्च अधिकारियों पर दबाव है, या भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हैं कि कार्रवाई नामुमकिन हो गई..?
दोहराए जा रहे पुराने घाव आरोपी अधिकारियों का काला इतिहास

यह पहली बार नहीं है जब ये नाम सुर्खियों में आए हों। मोहन सिंह जांगड़े पर पहले बावनकेरा समिति में वित्तीय गड़बड़ियों के गंभीर आरोप लग चुके हैं, जहां लाखों रुपये की अनियमितताएं सामने आई थीं। कांपा केंद्र में भी उनके कार्यकाल के दौरान स्टॉक में भारी कमी का मामला दर्ज है। वहीं, कुसुमलता निषाद का रिकॉर्ड भी दागदार है—बिरकोनी में ही 21 लाख से ज्यादा की कमी की जिम्मेदारी उन पर तय हुई है। इससे पहले परिवहन से जुड़े एक मामले में डीओ एडजस्टमेंट में हेराफेरी के चलते उन्हें निलंबित भी किया गया था। फिर भी, इन्हें दोबारा वित्तीय जिम्मेदारियां सौंपी जाना प्रशासन की लापरवाही को उजागर करता है। सवाल उठता है: क्या भ्रष्टाचारियों को बार-बार संरक्षण देने का सिलसिला कब रुकेगा..?
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