'सत्य' की ज़िद या नियमों का उल्लंघन? संसद में लद्दाख और 'नरवणे की किताब' पर आर-पार; क्या राहुल गांधी ने मोदी सरकार को फंसा दिया है? - Bebaak Bayan

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Tuesday, February 3, 2026

'सत्य' की ज़िद या नियमों का उल्लंघन? संसद में लद्दाख और 'नरवणे की किताब' पर आर-पार; क्या राहुल गांधी ने मोदी सरकार को फंसा दिया है?

नई दिल्ली (ब्यूरो): संसद का बजट सत्र आज किसी रणक्षेत्र से कम नजर नहीं आ रहा है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बीच जारी 'शब्द युद्ध' ने आज फिर सदन की कार्यवाही को ठप कर दिया। मामला उस 'अप्रकाशित' किताब का है जिसे सरकार ने अब तक रोक कर रखा है, लेकिन राहुल गांधी उसके पन्नों को सदन के पटल पर लहराकर सरकार की रणनीति पर सवाल उठा रहे हैं।

असली विवाद क्या है? (Original Angle) विवाद की जड़ में पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की यादें (Memoir) हैं, जिसका शीर्षक है 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' (Four Stars of Destiny)। राहुल गांधी ने 'द कारवां' मैगजीन में छपे उस लेख का हवाला दिया जिसमें दावा किया गया है कि अगस्त 2020 की उस रात जब चीनी टैंक कैलाश रेंज (Rechin La) की ओर बढ़ रहे थे, तब शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व ने सेना को स्पष्ट निर्देश देने में देरी की थी। राहुल का तर्क है कि सरकार इस किताब के प्रकाशन को इसलिए रोक रही है क्योंकि इसमें 2020 के लद्दाख संकट के दौरान पीएमओ (PMO) की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए गए हैं।

सदन का माहौल: 'परमिशन' शब्द पर तकरार (Reporting Feel) आज सुबह लोकसभा में तब माहौल और गरमा गया जब राहुल गांधी ने चेयर (अध्यक्ष) द्वारा 'परमिशन' (अनुमति) शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई। राहुल ने सीना तानकर कहा— "मैं विपक्ष का नेता हूँ, मुझे बोलने के लिए किसी की अनुमति की जरूरत नहीं, यह मेरा संवैधानिक अधिकार है।" इसके बाद ट्रेजरी बेंच (सत्ता पक्ष) से 'नियम 349' का हवाला दिया गया, जो कहता है कि सदन में बिना ऑथेंटिकेशन के किसी भी बाहरी लेख या अप्रकाशित किताब का जिक्र नहीं किया जा सकता। राजनाथ सिंह ने इसे 'देश को गुमराह करने वाली राजनीति' करार दिया।

क्या कहते हैं ग्राउंड के लोग? (Human Touch) संसद की कैंटीन से लेकर दिल्ली के सियासी गलियारों तक, चर्चा सिर्फ एक ही है— "क्या एक फौजी की अधूरी किताब सरकार के लिए गले की हड्डी बन गई है?" पूर्व सैनिकों के बीच भी इस पर दो राय हैं। कुछ का कहना है कि सैन्य संस्मरणों को सेंसर करना सुरक्षा के लिए जरूरी है, तो कुछ इसे 'इतिहास को दबाने' की कोशिश मान रहे हैं। लद्दाख के एक स्थानीय युवा ने फोन पर 'बेबाक बयान' से कहा— "हमें आंकड़ों से मतलब नहीं, हमें यह जानना है कि हमारी ज़मीन पर उस रात क्या हुआ था।"

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