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Saturday, August 30, 2025

आखिर छुरा के अस्पतालों में ही क्यों होती है..! इलाज के दौरान मौत...!

14 वर्षीय जिज्ञासा की मौत चीख चीख कर न्याय मांग रही हैं।

मां बाप का रो-रो कर हो रहा बुरा हाल

रिपोर्टर मयंक गुप्ता गरियाबंद / गरियाबंद जिले का एक मात्र ऐसा आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है। जहां पर सिर्फ और सिर्फ मौत की दास्तां दिखाई देती है। इस क्षेत्र का पहला ऐसा घटना नहीं है यहां पर अनगिनत घटना घटित हो चुके है और तो और निजी अस्पतालों को भी सील किया जा चुका है। फिर भी आज तक ऐसी कोई सराहना वाली कार्यशैली नहीं की गई है जिससे इस क्षेत्र का जिले भर में नाम हो। समाचार लिखते हुए यह अहसास होता है कि, यहां पर बिना डिग्रीधारी चिकित्सकों के लिए प्रयोग शाला खुला हो। बता दे कि,इसीलिए यहां मरीज को जिस किसी भी अस्पतालों में इलाज के लिए ले जाने पर कोई रिफर नहीं करता है और तब तक उस मरीज की बॉडी पर वर्कआउट किया जाता है जब तक उनकी प्रयोग पूरी न हो जाए। प्रयोग पूरी होने मामला हाथ से फिसलने को स्थिति निर्मित होती है तो सब उस मरीज को किसी अन्यत्र जगह या छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर रिफर करने की सलाह देते है और पल्ला झाड़ने में लग जाते है। इसका अंतिम परिणाम परिजनों को केवल और केवल मृत शरीर ही प्राप्त होता है।

मरीज को रिफर करने वाले चिकित्सक को पता होता है ये कितने समय की मेहमान है।

अक्सर हम अपने आस पास के क्षेत्रों में देखते है या सुनते है की मरीज को रायपुर ले जाते या फिर किसी अन्य अस्पतालों में दाखिल के लिए ले जाते हुए मरीज की सांस थम जाती है। कहने का तात्पर्य यह है कि, यदि मरीज को आपके अस्पताल में सही इलाज नहीं मिलने वाला है या फिर उस बीमारी से संबंधित चिकित्सक आपके पास उपलब्ध नहीं तो मरीज को एडमिट नहीं लेना चाहिए, किंतु यह भी झुठलाया नहीं जा सकता है यदि मरीज को एडमिट नहीं करेंगे तो इन निजी अस्पतालों का भट्ठा बैठ जाएगा इनकी दुकानदारी बंद हो जाएगी और यही कटु सत्य है। हमको अपनो से दूर होना पड़ता है। ये कहानी सिर्फ एक व्यक्ति विशेष की नहीं है अपितु इस क्षेत्र के अनगिनत लोगों की है जो छुरा क्षेत्र में संचालित हो रहे निजी अस्पतालों की प्रकोप से पीड़ित है।

ऐसा ही फिर से एक मामला हमारे संज्ञान में आया है। किंतु ये निजी अस्पताल से संबंधित नहीं अपितु सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र छुरा का है जिसमें पढ़े लिखे अपने आप को एम.बी.बी.एस. से कम नहीं आंकते है। बता दे कि, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र छुरा में घटी एक ऐसी दिल दहला देने घटना। महज़ 14 वर्षीय जिज्ञासा की मौत ने पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया है। मृतक जिज्ञासा के परिजनों ने आरोप लगाया है कि, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र छुरा में पदस्थ प्रशिक्षु चिकित्सकों की लापरवाही और ओवरडोज दवा देने की वजह से 14 वर्षीय जिज्ञासा की मौत हो गई है। अब सवाल खड़े हो रहे हैं कि आखिर कब तक स्वास्थ्य व्यवस्था की लापरवाहियों की कीमत आम लोगों को अपनी जान देकर चुकानी होगी..?

*क्या है पूरा मामला?*

वार्ड नं. 12, झूलेलाल पारा, छुरा निवासी जिज्ञासा (14 वर्ष) को 15 जुलाई 2025 की रात अचानक पेट दर्द, गैस, सीने में जलन और पीठ में तेज दर्द की शिकायत हुई। घबराए परिजन उसे रातों-रात सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र छुरा लेकर पहुँचे।

परिजनों के अनुसार, वहाँ ड्यूटी पर मौजूद प्रशिक्षु चिकित्सक डॉ.अभिषेक ने मरीज को बिना गंभीरता पूर्वक देखे बिना ही केवल प्राथमिक की प्रक्रिया किए और बोले कोई दिक्कत वाली बात नहीं है ठीक हो जाएगा।इसको रायपुर ले जाओ कहते हुए रायपुर रेफर कर दिया। इस दौरान डॉक्टर ने जो दवाएँ दीं, उसे लेकर परिजनों का बड़ा आरोप है – “डॉक्टर ने ओवरडोज़ दवा दे दी, जिससे हालत और बिगड़ गई।”

16 जुलाई की रात करीब 3 बजे, जिज्ञासा को कुर्रा आयुष्मान हॉस्पिटल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई…

*“जिज्ञासा जिंदा है” – परिजनों का रोना, डॉक्टरों के बयान में विरोधाभास*

परिजन शव को लेकर गोबरा-नयापारा सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र पहुँचे। वहाँ भी डॉक्टरों ने स्पष्ट कहा कि “मौत ओवरडोज़ से हुई है, पोस्टमार्टम जरूरी है।”

परिजन पोस्टमार्टम नहीं कराना चाहते थे और सीधे घर चले आए। घर पहुँचकर परिजनों का दर्द और बढ़ गया। वे बार-बार कहते रहे – “जिज्ञासा अभी जिंदा है, उसकी नस-नाड़ी चल रही है।”

इस पर स्थानीय डॉक्टर को बुलाया गया, जिसने जांच के बाद साफ कहा – “जिज्ञासा की मौत को लगभग 1 घंटा हो चुका है।”

यानी एक ही प्रकरण में अलग-अलग डॉक्टरों के विरोधाभासी बयान सामने आए।

*अब उठ रहे हैं बड़े सवाल –*

1. क्यों प्रशिक्षु डॉक्टर ने गंभीर मरीज को बिना उचित इलाज सिर्फ रेफर कर दिया?

2. क्या दवाओं का ओवरडोज़ ही मौत का कारण बना?

3. आयुष्मान हॉस्पिटल और स्थानीय डॉक्टरों के बयान में इतना विरोधाभास क्यों है?

4. जब तक परिजन कहते रहे कि जिज्ञासा जीवित है, तब तक स्वास्थ्य तंत्र ने स्पष्टता क्यों नहीं दी?

*परिजनों का आक्रोश – "हमारी बेटी व्यर्थ न जाए"*

जिज्ञासा के पिता प्रकाश कुमार यादव (पत्रकार) ने आक्रोशित होते हुए कहा – “हमारी बेटी अब इस दुनिया में नहीं है। लेकिन उसकी मौत व्यर्थ नहीं जानी चाहिए। एक प्रशिक्षु डॉक्टर की लापरवाही ने उसकी जान ले ली। इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो, दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जाए और भविष्य में किसी अन्य बेटी को ऐसी लापरवाही का शिकार न होना पड़े।”

*जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी*

इस मामले पर अब तक सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र छुरा और जिला स्वास्थ्य विभाग की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। वहीं स्थानीय लोगों का कहना है कि “अगर अस्पतालों में प्रशिक्षु डॉक्टरों को इतनी बड़ी जिम्मेदारी दी जाएगी तो आने वाले दिनों में और भी ऐसी त्रासदी सामने आ सकती है।”

जिज्ञासा की मौत सिर्फ एक बच्ची की मौत नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र पर सवाल है। छुरा अस्पताल की लापरवाही ने एक परिवार की हँसी-खुशी छीन ली। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मामले को गंभीरता से लेकर कार्रवाई करता है या इसे भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबा देता है।

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