13 साल की लूट और उत्पीड़न के आरोप, अधिकारियों की हड़ताल से किसानों का भविष्य खतरे में...!
रिपोर्टर मयंक गुप्ता
महासमुंद / 14 अक्टूबर 2025 छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में कृषि विभाग के अंदर उबाल आ चुका है। यहां के सभी ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी एकजुट होकर अनिश्चितकालीन हड़ताल पर बैठ गए हैं। यह आंदोलन छत्तीसगढ़ कृषि स्नातक शासकीय कृषि अधिकारी संघ की अगुवाई में चल रहा है, और इनकी सिर्फ एक मांग है - जितेंद्र पटेल नामक अधिकारी को फौरन उनके मूल पद पर वापस भेजा जाए। पटेल पर गंभीर आरोप लगे हैं कि वे मैदानी स्तर के कर्मचारियों के साथ बदसलूकी करते हैं, झूठी जानकारियां फैलाते हैं और उप संचालक कृषि का नाम लेकर उन्हें मानसिक रूप से तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। संघ के नेता बताते हैं कि पहले भी कई बार शिकायतें की गईं, लेकिन ऊपर से कोई सुनवाई नहीं हुई, जिससे मजबूरन हड़ताल का रास्ता अपनाना पड़ा।
इस हड़ताल से जिले भर के कृषि कार्यालयों में सन्नाटा पसर गया है। ये ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी किसानों के लिए जीवनरेखा जैसे हैं - वे बीज बांटते हैं, सब्सिडी वाली योजनाओं को लागू करते हैं और फसलों पर सलाह देते हैं। अब जब ये धरने पर हैं, तो किसानों की मुसीबतें दोगुनी हो गई हैं। खासकर पोस्ट-मानसून सीजन में, जब बुआई का समय है और उर्वरक की जरूरत चरम पर है। जिला मुख्यालय के कृषि कार्यालय के बाहर सैकड़ों प्रदर्शनकारी जमा हैं, उनके हाथों में तख्तियां हैं जिन पर लिखा है: "पटेल को हटाओ, किसानों को न्याय दो!" और "उत्पीड़न बंद करो, विभाग बचाओ!" माहौल में गुस्सा और निराशा साफ झलक रही है, और अगर जल्द कोई हल न निकला तो स्थिति और बिगड़ सकती है।
पटेल का 13 सालों का 'राज': अनियमितताओं की लंबी फेहरिस्त
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, जितेंद्र पटेल पिछले 13 साल से महासमुंद में ही अटैचमेंट पर जमे हुए हैं, जो सरकारी नियमों की खुली अवहेलना है। सामान्यत: अधिकारियों को एक जगह पर ज्यादा समय नहीं रखा जाता ताकि सिस्टम में पारदर्शिता बनी रहे, लेकिन यहां मामला उलटा है। इन सालों में पटेल पर आरोप है कि उन्होंने केंद्र और राज्य सरकार की कई कृषि योजनाओं में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियां कीं। मिसाल के तौर पर, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना में सहायता राशि का गलत वितरण, फसल बीमा स्कीम में फर्जी क्लेम, उर्वरक सब्सिडी में घपला और बीज वितरण में मिलीभगत। कई किसानों ने गुमनाम रहते हुए बताया कि उनकी मदद की रकम या तो देर से आती है या फिर बिचौलियों के जेब में चली जाती है। पटेल के चहेतों को फायदा पहुंचाने के लिए कागजी कार्रवाई में हेरफेर किया जाता था, जिससे गरीब और छोटे किसान सबसे ज्यादा मारे गए। एक प्रभावित किसान ने कहा, "हमारी फसलें तो सूख रही हैं, लेकिन कागजों पर सब्सिडी का पैसा उड़ गया। ऐसे अधिकारी किसानों के लिए अभिशाप हैं।"
यह सिर्फ पैसे की लूट नहीं, बल्कि सिस्टम की जड़ों को खोखला करने की कहानी है। महासमुंद जैसे कृषि-प्रधान जिले में जहां धान, दालें, सब्जियां और फल मुख्य फसलें हैं, वहां ऐसी अनियमितताएं किसानों की कमर तोड़ देती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक एक जगह रहने से अधिकारी स्थानीय प्रभावशाली लोगों से सांठगांठ कर लेते हैं, जो योजनाओं को पटरी से उतार देता है।
संघ की आवाज अविनाश चंद्राकर का बयान
संघ के जिला अध्यक्ष अविनाश चंद्राकर ने इस मुद्दे पर खुलकर बात की। उन्होंने कहा, "यह महज विभागीय झगड़ा नहीं है, बल्कि किसानों के अधिकारों की लड़ाई है। पटेल ने 13 सालों में लूट का कोई मौका नहीं छोड़ा - हर योजना में घोटाले हुए। मैदानी अधिकारियों को डराया-धमकाया जाता है, गलत डेटा थोपा जाता है। उप संचालक का नाम लेकर हमें तंग किया जा रहा है। हमने कई बार लिखित शिकायतें दीं, लेकिन कोई एक्शन नहीं। अब हड़ताल से अपनी आवाज उठा रहे हैं। जब तक पटेल को उनकी मूल पोस्टिंग पर नहीं भेजा जाता, हमारा संघर्ष थमेगा नहीं।" चंद्राकर ने यह भी जोड़ा कि अगर मांगें न मानी गईं तो राज्य स्तर पर आंदोलन फैल सकता है, जिसमें किसान संगठन भी शामिल होंगे।
विभाग में डर का साया, सरकार की खामोशी
महासमुंद छत्तीसगढ़ का एक महत्वपूर्ण कृषि केंद्र है, जहां लाखों परिवार खेती पर निर्भर हैं। ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी किसानों के साथ सीधे जुड़े रहते हैं, लेकिन पटेल की कथित ज्यादतियों से विभाग में डर का माहौल है। एक अनाम वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि मीटिंग्स में पटेल सहकर्मियों को अपमानित करते हैं और काम न करने पर धमकियां देते हैं। इससे कर्मचारियों का उत्साह गिरा है और योजनाओं का फायदा सही लोगों तक नहीं पहुंच रहा।
उप संचालक कृषि कार्यालय की ओर से अब तक कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। जितेंद्र पटेल से संपर्क करने की कोशिशें भी नाकाम रहीं। राज्य के कृषि विभाग के उच्चाधिकारियों ने सिर्फ इतना कहा कि जांच चल रही है, लेकिन कोई कंक्रीट ऐलान नहीं। विश्लेषकों का मानना है कि अगर जल्द समाधान न हुआ तो यह आंदोलन पूरे छत्तीसगढ़ में फैल सकता है, जो किसानों के लिए और बड़ी मुश्किलें पैदा करेगा।
भविष्य की चुनौतियां किसानों की उम्मीदें टिकीं
यह पूरा वाकया छत्तीसगढ़ कृषि विभाग में जवाबदेही और ईमानदारी की कमी को उजागर करता है। पटेल जैसे अधिकारियों की लंबी पोस्टिंग पर सवाल उठ रहे हैं कि क्या नियम सिर्फ कागजों तक सीमित हैं? संघ ने 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया है कि अगर मांगें न मानी गईं तो आंदोलन तेज होगा। कई किसान संघों ने समर्थन जताया है और कह रहे हैं कि यह लड़ाई सिर्फ अधिकारियों की नहीं, बल्कि किसानों की जीविका की है। हम इस घटनाक्रम पर पैनी नजर रखे हुए हैं। अगर आपके पास कोई अतिरिक्त विवरण है, तो हमें बताएं।
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