आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का विद्रोह: सुपरवाइजर की मनमानी से भड़का गुस्सा, 7 दिन में मानदेय न लौटा तो ब्लॉक-जिला स्तर पर धरना-प्रदर्शन..! - Bebaak Bayan

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Monday, October 6, 2025

आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का विद्रोह: सुपरवाइजर की मनमानी से भड़का गुस्सा, 7 दिन में मानदेय न लौटा तो ब्लॉक-जिला स्तर पर धरना-प्रदर्शन..!

रिपोर्टर मयंक गुप्ता महासमुंद / 6 अक्टूबर 2025 छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के सरायपाली ब्लॉक में आंगनबाड़ी केंद्रों की कार्यकर्ताओं ने अपने कटे हुए मानदेय को लेकर खुला विद्रोह का ऐलान कर दिया है। ग्रामीण इलाकों में बच्चों और महिलाओं की देखभाल का जिम्मा संभालने वाली इन बहादुर महिलाओं का आरोप है कि उनकी मेहनत का इनाम सुपरवाइजर की मनमानी से छीना जा रहा है। जुलाई से सितंबर तक के तीन महीनों का मानदेय बिना किसी ठोस वजह के काट दिए जाने से नाराज कार्यकर्ताओं ने जिला कलेक्टर को औपचारिक शिकायत सौंपी है और साफ चेतावनी दी है—सात दिनों के अंदर अगर इंसाफ न मिला तो वे जिला मुख्यालय और ब्लॉक स्तर पर घेराबंदी करेंगी। यह मामला केदुवा आंगनबाड़ी सेक्टर का है, जहां करीब तीन दर्जन से अधिक कार्यकर्ताओं का भविष्य दांव पर लटका हुआ है। सुपरवाइजर वर्षा अग्रवाल पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं कि उन्होंने हितग्राहियों के केवाईसी (फैमिली रजिस्टर सर्विस) अपडेट न होने का बहाना बनाकर कार्यकर्ताओं का कठोरता से मानदेय काट लिया। लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल उलट है। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां नेटवर्क की किल्लत आम बात है, वहां हितग्राही समय पर केंद्र पहुंच ही नहीं पाते। ऊपर से मोबाइल सिग्नल की समस्या, ओटीपी वेरिफिकेशन की जटिलताएं और दूर-दराज के गांवों की दुर्गमता—ये सब मिलकर केवाईसी प्रक्रिया को लेट कर देते हैं। कार्यकर्ताओं का दर्द यहीं खत्म नहीं होता; वे बताती हैं कि जिला स्तर से पहले ही स्पष्ट आदेश जारी हो चुके थे कि अगर किसी हितग्राही का केवाईसी समय पर पूरा न हो पाए, तब भी उन्हें सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ मिलना चाहिए। फिर भी सुपरवाइजर ने इन नियमों की अनदेखी की और न सिर्फ मानदेय काटा, बल्कि अपमानजनक भाषा का भी सहारा लिया। "हम दिन-रात गांव-गांव घूमकर पोषण, टीकाकरण और जागरूकता फैलाते हैं, लेकिन सुपरवाइजर का व्यवहार ऐसा है मानो हमारी मेहनत बेकार हो," एक कार्यकर्ता ने गुस्से में कहा। उनका यह गुस्सा जायज लगता है, क्योंकि सुपरवाइजर द्वारा बार-बार दोहराए जाने वाले वाक्य जैसे "दूसरे विभाग आपको पैसे नहीं देते, फिर भी आप उनका काम क्यों करती हो?" न सिर्फ उनके मनोबल को चूर-चूर करते हैं, बल्कि आंगनबाड़ी सिस्टम की मूल भावना को भी ठेस पहुंचाते हैं। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताएं तो समाज की रीढ़ हैं—वे न सिर्फ बच्चों को पौष्टिक भोजन देती हैं, बल्कि गर्भवती महिलाओं की देखभाल से लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों तक सब संभालती हैं। ऐसी स्थिति में उनका शोषण न केवल व्यक्तिगत अन्याय है, बल्कि पूरे सिस्टम की कमजोरी को उजागर करता है। शिकायत में कलेक्टर से तीन प्रमुख मांगें रखी गई हैं।

तत्काल बहाली

कटे हुए मानदेय की राशि को बिना देरी के बहाल किया जाए, ताकि कार्यकर्ताओं का आर्थिक संकट समाप्त हो।

निष्पक्ष जांच

सुपरवाइजर की पक्षपातपूर्ण और मनमाने फैसलों की गहन जांच हो, जिसमें यदि दोषी पाई गईं तो सख्त कार्रवाई सुनिश्चित हो।

भविष्योन्मुखी कदम

ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने हेतु जिला स्तर पर स्पष्ट गाइडलाइंस जारी की जाएं, जिसमें नेटवर्क जैसी व्यावहारिक चुनौतियों को ध्यान में रखा जाए।

यह शिकायत न सिर्फ कलेक्टर के पास पहुंची है, बल्कि जिला कार्यक्रम अधिकारी और सरायपाली के परियोजना अधिकारी को भी इसकी प्रतियां सौंप दी गई हैं। ज्ञापन सौंपने वालों में छत्तीसगढ़ सक्षम आंगनबाड़ी कार्यकर्ता सहायिका कल्याण संघ की प्रदेश अध्यक्ष सुधा रात्रे, जिला अध्यक्ष सुलेखा शर्मा, छाया हिरवानी, हाजरा खान, धनमती बघेल, रंभा जगत, रूपाभारती, विमला सोनी, पूर्णिमा ठाकुर, सुल्ताना खान, अंजू चंद्राकर, रागनी चंद्राकर, सुशीला और हरपाल जैसी प्रमुख नेता शामिल रहीं। संघ की यह एकजुटता दर्शाती है कि यह मुद्दा अब व्यक्तिगत नहीं, बल्कि पूरे आंगनबाड़ी समुदाय का हो चुका है। यदि सात दिनों के अंदर कोई सकारात्मक कदम नहीं उठा, तो कार्यकर्ताओं का आंदोलन सड़कों पर उतर सकता है। यह न सिर्फ स्थानीय स्तर पर हलचल मचा सकता है, बल्कि राज्य सरकार को भी आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की लंबे समय से चली आ रही समस्याओं—जैसे अपर्याप्त मानदेय, ट्रेनिंग की कमी और संसाधनों की किल्लत—पर ध्यान देने को मजबूर कर सकता है। जिला प्रशासन अब इस संवेदनशील मुद्दे पर त्वरित कार्रवाई करेगा या फिर आंदोलन की आग भड़कने देगा? आने वाले दिनों में इसका जवाब मिलेगा।

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